सरकारी जमीनों को बेचा, छापे पड़े लेकिन नहीं हुई कार्यवाही, बीस साल में कमाया 100 करोड़
मुरैना । एक कहावत है कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली । ये कहावत मुरैना के कुछ तथाकथित पटवारियों पर बिल्कुल सटीक बैठती है क्योंकि करीब बीस साल पहले भाड़े के मकान में रहकर छात्रों के मूल निवासी पर दस्तखत करने के लिए दस रुपए की खैरात लेने वाले तथाकथित पटवारी आज करीब 200 करोड़ की संपत्ति के मालिक बने बैठे हैं । इतना ही नहीं कुछ पटवारियों ने पटवारियत को खानदानी रैयत बना लिया है । सत्ता की गोद में बैठे खद्दर धारियों की मिली भगत से सरकारी जमीनों में हेराफेरी कर उनको बेचकर आज अरबों रुपए के धन कुबेर बन चुके हैं । सौ बीघा जमीन, आलीशान तीन तीन मकान, गाड़ी, फार्म हाउस जैसी व्यवस्थाओं से सुसज्जित धन कुबेरों ने लोकायुक्त को भी जेब में बिठा रखा है । शायद यही वजह है कि एक पटवारी के घर क्रिफ्टोकरेंसी का सर्वर और करोड़ों के दस्तावेज मिलने पर भी महज खानापूर्ति कर खुले सांड की तरह आम जनता को लूटने के लिए छोड़ दिया जाता है । लोकायुक्त, इनकम टैक्स, ईडी, आर्थिक अपराध शाखा (EOW), के भ्रष्टाचार का इससे ज्यादा प्रमाण क्या चाहिए .?
शायद यही वजह है कि शासन के द्वारा जारी स्थानांतरण आदेश के बाद भी मुरैना जिले में अभी तक पटवारियों के स्थानांतरण की सूची जारी नहीं की है । इससे एक बात साफ नजर आती है कि शासन के आदेश पर राजनीति और पटवारियों का राजनीतिक रसूख, संबंध शासन पर भारी पड़ रहे हैं । अपनों पै करम गैरों पै सितम करते हुए प्रशासनिक मुखिया ने केवल गिने चुने लोगों के स्थानांतरण क्यों किए ? जबकि जिले के चार दर्जन विभागों की करीब दो सौ शाखाओं में पदस्थ सभी तहसीलों में एक सैकड़ा से अधिक कर्मचारी, पटवारी पिछले दस साल से पदस्थ हैं जिनमें कुछ तो ग्रह तहसील में जमे होकर मलाई खा रहे हैं, कुछ पटवारी वर्षों से घर बैठे की पगार ले रहे हैं तो कुछ पटवारियों ने शानदार ऑफिस भाड़े पर लेकर दो चार कर्मचारी दलाल बनाकर तहसील कार्यालय के चक्कर काटने के लिए लगा रखे हैं। जाहिर है पटवारियों को ऐसी कितनी पगार मिलती है जिसमें शानदार ऑफिस के साथ निजी कर्मचारियों को भी मैनेज किया जा रहा है ?
